

बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार ।
ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार ॥
भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम ।
कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥
॥ १ ॥
जय सन्तोषी मात अनूपम।
शान्ति दायिनी रूप मनोरम॥
॥ २ ॥
सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा।
वेश मनोहर ललित अनुपा॥
॥ ३ ॥
श्वेताम्बर रूप मनहारी।
माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी॥
॥ ४ ॥
दिव्य स्वरूपा आयत लोचन।
दर्शन से हो संकट मोचन॥
॥ ५ ॥
जय गणेश की सुता भवानी।
रिद्धि-सिद्धि की पुत्री ज्ञानी॥
॥ 6.
अगम अगोचर तुम्हरी माया।
सब पर करो कृपा की छाया॥
॥ ७ ॥
नाम अनेक तुम्हारे माता।
अखिल विश्व है तुमको ध्याता॥
॥ ८ ॥
तुमने रूप अनेकों धारे।
को कहि सके चरित्र तुम्हारे॥
॥ ९ ॥
धाम अनेक कहाँ तक कहिये।
सुमिरन तब करके सुख लहिये॥
॥ १० ॥
विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी।
कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी॥
॥ 11.
कलकत्ते में तू ही काली।
दुष्ट नाशिनी महाकराली॥
॥ १२ ॥
सम्बल पुर बहुचरा कहाती।
भक्तजनों का दुःख मिटाती॥
॥ १३ ॥
ज्वाला जी में ज्वाला देवी।
पूजत नित्य भक्त जन सेवी॥
॥ 14.
नगर बम्बई की महारानी।
महा लक्ष्मी तुम कल्याणी॥
॥ 15.
मदुरा में मीनाक्षी तुम हो।
सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो॥
॥ १६ ॥
राजनगर में तुम जगदम्बे।
बनी भद्रकाली तुम अम्बे॥
॥ 17.
पावागढ़ में दुर्गा माता।
अखिल विश्व तेरा यश गाता॥
॥ १८ ॥
काशी पुराधीश्वरी माता।
अन्नपूर्णा नाम सुहाता॥
॥ १९ ॥
सर्वानन्द करो कल्याणी।
तुम्हीं शारदा अमृत वाणी॥
॥ 20.
तुम्हरी महिमा जल में थल में।
दुःख दारिद्र सब मेटो पल में॥
॥ २१ ॥
जेते ऋषि और मुनीशा।
नारद देव और देवेशा॥
॥ २२ ॥
इस जगती के नर और नारी।
ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी॥
॥ 23.
जापर कृपा तुम्हारी होती।
वह पाता भक्ति का मोती॥
॥ २४ ॥
दुःख दारिद्र संकट मिट जाता।
ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता॥
॥ २५ ॥
जो जन तुम्हरी महिमा गावै।
ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै॥
॥ 26.
वह मन जो शुद्ध भावनाओं को रखता है।
इसलिए अपनी इच्छाओं को पूरा करें।
॥ 27.
कुमति निवारि सुमति की दात्री।
जयति जयति माता जगधात्री॥
॥ २८ ॥
शुक्रवार का दिवस सुहावन।
जो व्रत करे तुम्हारा पावन॥
॥ 29.
गुड़ छोले का भोग लगावै।
कथा तुम्हारी सुने सुनावै॥
॥ ३० ॥
विधिवत पूजा करे तुम्हारी।
फिर प्रसाद पावे शुभकारी॥
॥ ३१ ॥
यह धन की शक्ति और शक्ति है। ब्राह्मणों को दान
देना है।
॥ ३२ ॥
वे जगती के नर औ नारी।
मनवांछित फल पावें भारी॥
॥ ३३ ॥
जो जन शरण तुम्हारी जावे।
सो निश्चय भव से तर जावे॥
॥ ३४ ॥
तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे।
निश्चय मनवांछित वर पावै॥
॥ ३५ ॥
सधवा पूजा करे तुम्हारी।
अमर सुहागिन हो वह नारी॥
॥ ३६ ॥
विधवा धर के ध्यान तुम्हारा।
भवसागर से उतरे पारा॥
॥ ३७ ॥
जयति जयति जय संकट हरणी।
विघ्न विनाशन मंगल करनी॥
॥ ३८ ॥
हम पर संकट है अति भारी।
वेगि खबर लो मात हमारी॥
॥ ३९ ॥
निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता।
देह भक्ति वर हम को माता॥
॥ ४० ॥
यह चालीसा जो नित गावे।
सो भवसागर से तर जावे॥
संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास ।
पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥
चालीसा भारत में विभिन्न स्थानों – विंध्याचल, कोलकाता, ज्वालाजी, मुंबई, मदुरै, काशी और पावागढ़ में संतोषी माता की अभिव्यक्तियों का वर्णन करती है – जिसमें दिखाया गया है कि कैसे पूरे देश में कई नामों और रूपों के तहत एक दिव्य मां की पूजा की जाती है।
